कविता – क्या यह रात फिर भी ढल जाएगी?

कविता - क्या यह रात फिर भी ढल जाएगी?

बातें चाहे हज़ार करूं
एक ही किस्से सौ बार कहूं 
क्या यह रात फिर भी ढल जाएगी?

अंधेरे को मैं क्या ही निहारूं
किस तरह आपको वापस हँसता देख पाऊं
अभी भी आपकी हँसी क्या मुझे खोजती हैं? 
या पता ढूंढते ढूंढते कहीं थक न जाती हैं
ज़ोर से अगर मैं हँस दालू, क्या आप सुन पाओगी?
मैं अंधेरे से ही दिशा मांगू
क्या फिर भी यह रात ढल जाएगी?

जिस कोने में तुम जो ठहरी , वो कोना न रह पाता हैं
नज़रे सारी उधर ही सिम्टी 
जैसे कोई हंस सुस्ता मिल आया हैं
रात्रि की गुफ्तगू में, तेरी हँसी जिस तरह मुझे खोज पाती हैं
अंधेरे का मत पूछो, पर सब उजला कर ,
शायद ठहरने आई हैं
अब मैं मूर्ख इसे देखने कब तक ही बैठ पाऊंगी
जब अब सब जगमग लगना हैं
क्या यह रात फिर भी ढल जाएगी?

- अदिति सिंह

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