कविता – कान्हा

 मैं आपके बारे में क्या ही लिखूं 

नहीं हू उतनी श्रेष्ठ मैं

आपको अपना भाई या दोस्त बनाकर 

पता नही क्या क्या बता चली जाती मैं 

इसी दोस्ती में ही सही

मेरी सवारी आपने भी उठाई हैं 

हर समय अपनी शय्या मे रखकर

लोड़ी भी कितनी गाई है

जब मैं आपको देखती हू

लगता नही आप भगवान हो

इतने खास होकर भी

क्यों मिल जाते हज़ार हो?

सीखने जाऊ आपसे

तो बन जाते विशाल हो

कैसे मानू आपको खास?

हर चीज में हस देते हो

जहां उम्मीद नहीं थी

उधर बिस्तर रख देते हो

दोस्ती करू या पूजा

नही समझ पाती हु 

अभी दो कश्ती में मैं बैठी

तेरे रूप न गिन पाती हु

इतने खास होकर भी

क्यों इतने मेहरबान हो

दोस्ती और आपकी पूजा ने 

मुझे खूब फसाया है

छोटे बहुत हो आप

पर क्या मस्त सद्यंत्र रचाया हैं ।


- अदिति सिंह






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